Sunday, November 9, 2008

Causes of Present Economic Recession CRISES

Is Over Expansion of Credit and Excessive Speculation not the root cause of present Economic Crisis ?

A person should try and live within the available means and not the expected means. When we want to overstretch, we use the word growth, progress etc, which sound very lucid, but are the same that take you into great trouble, unless U are lucky enough.

Secondly, over speculation is the reason. When a person wants to become rich quickly, he is tempted to gamble, and the case of governments can be no exception as we have seen in India, where stock trading was made akin to casinos. The government and the regulators slept and the common man suffered.

Due to paucity of time, I am unable to elaborate. Looking forward to your valuable comments and opinions

Monday, November 3, 2008

मूल्य वर्धित प्रलाणी का वार्षिक रिटर्न ३१.१०.२००८ तक जाना था, पर व्यापारी क्या करे जब रिटर्न का फारम नम्बर २६ ही उपलब्ध नही है ? आज ३.११.२००८ हो गई है, और उत्तर प्रदेश का व्यापारी वा कर सलाहाकार अत्यन्त उलझन में है ? क्या होगा ? क्या होना चाहिए ? क्या नेता वा बाबू जागेंगे ? या व्यापारी और कर सलाहकार ऐसे ही परेशान होते रहेंगे ?
"कीर्ति बाजपेयी, कर सलाहकार - अधिवक्ता "

Monday, October 27, 2008

FIIS and DIIs

Why is it that we Indians Get fooled so easily, more so by our leaders/beurocrats/and Foreigners? Any Amswers, I'll welcome them!!!!

Saturday, October 11, 2008

उत्तर प्रदेश और मूल्य वर्धित प्रलीन वा प्रवेश कर

उत्तर प्रदेश सरकार ने वेट व प्रवेश कर में संशोधन किया है, जो की अनौचित्य हैं और व्यापार का पलायन होगा और आम जनता, जो की पहले से ही मुद्रा स्फीति से परेशान हैं और परेशान होगी? और क्या सरकार को आम आदमी का ख्याल नही करना चाहिए? क्या केवल स्मारक और पार्क बनाने से उसका भला होता है? क्या शाहजहाँ ने ताजमहल बनाकर उपने वंश को ख़तम करने की शुरुआत नही कर दी थी।? और क्या अम्रीका का वाही हाल नही हुआ ? उत्तर प्रदेश का व्यापारी पहले से ही बिजली से, सडको से , रोज बदलते हुयें कानूनों से जो बहुत तेजी से बदल रहे हैं , व उसकी अन्य भी बहुत परेशानियाँ हैं, जिससे वह पहले से ही परेशान है।

Friday, October 10, 2008

शेयर बाज़ार

आज भी बाज़ार लगभग ८०० अंक गिरा । आगे क्या होगा, कहना सम्भव भी है और असंभव भी। हम १९३० के समान भयंकर समय में हैं। विश्व घनघोर मद्दी के दौर में है। जैसा की १९३० में हुआ था । मेरा पहले आंकलन ९००० के करीब था। लेकिन अब बाज़ार मुझे उससे भी खराब दिख रहा है। आप क्या सोचते है । आप के विचारों का मैं इंतज़ार करूँगा ।

Tuesday, October 7, 2008

हम कहाँ जा रहे हैं ?

हम विशवास करते हैं कि हम भारतीये नागरिकों को नुक्सान नही होने देंगे । दुनिया के चंद बारे लोग भारत के लोगो को वित्तायी रूप से छति पहुंचाना चाहते हैं, और हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी सरकार, राज नेता सोयें हैं । हम क्या करे ? आज जो हो रहा है वोह पहले से दिख रहा था लेकिन व्यवहारिक ज्ञान की कमी के कारन हम समझ नही पाये ? और क्या भारत के बहुत इमानदार समझें जाने वाले नेता क्या अपनी ही जनता को लुटते नही रहे ? और यह दुनिया के नेताओं वा बाबुओं के साथ भी सच नही है? निम्न को संचें व विचार करें :
१- जब अगस्त २००७ में एउरोप और अम्रीका ने अपने खजाने खोल दिए थे, तब हमारा बी एस सी बढ़ रहा था, और १४०००-१५००० से बढ़कर २१०००-२२००० हो गया था, तब हमारी सरकार क्या सो रही थी ?
२- जब आम नागरिक ने पेप्सी और कोक का विरोध किया, तब सरकार ने कहा कि अगर हम उनको रोकेंगे तो विदेशी निवेश को ग़लत संकेत देंगे और रोकने से पीछे हट गयी । क्या तब भी सरकार जगी जब उनमे से एक ने भारतीये कंपनियों को बाज़ार से बहार करने के लिए उनकी बोतले तोध्ना चल्लो कर दिया? और क्या तब भी सरकार सो रही थी जब एक दूसरी कंपनी ने कुछ बहर्तिया कम्पनियों को 'ब्लाक्क्मैल" कर के खरीद लिया ?

३- क्या यह सत्य नही है कि हम एटॉमिक डील पुर अपनी पीठ ठोकना चाहते हैं, और हमारे पास इतनी साधन भी नही हैं कि एक शहरी बच्चे को इम्तहान कि तयारी के लिए मोमबत्ती का सहारा नही लेना परता? एक नौकरी पेशा आदमी को बैंक से पैसा निकालने के लिए में अब्सेंट या हलफ डे नही झेलना परता , क्योंकि , बैंक का सर्वर डाउन होता है या बिजली नही होती ? क्या बिजली कि कमी होते हुवे वह ऐ टी एम् का प्रयोग कर सकता है ? यह तो हुई शहर कि बात, गाओं का क्या हाल है ?

४- हम, विदेशी से इतना प्रभावित हैं कि हम स्वदेश , उसके नियम, उसके संस्कारों नही भूल गए ?

५- मुझे बहुत कुछ कहना है, लेकिन समय मिलने पर, लेकिन मैं आपके भी विचारू को आमंत्रित करता हूँ, ताकि सार्थक मंथन हो सके और कोई हल निकल सके !!!!!

जय हिंद !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

Sunday, September 21, 2008

१. आज हम कहते हैं की ग्लोबल वार्मिंग है, और दूसीरी तरफ़ हम विज्ञापन पर जोर देते हैं । जिससे उपभोक्तावाद को भरवा मिलता है , और उससे वायुमंडल प्रभावित होता है । तो क्या कारों, और अन्य मशीनों पर प्रतिभंद नही लगना चाहिए ? और उनके विज्ञापन पर रोक नही लगनी चाहिये ?

२। क्या भारत में जनता के पैसे ( कर ) का सही उपयोग हो रहा है, नेताओं और बाबुओं ने तो अपनी आय तो बढ़ा ली ( इसमे उनकी ऊपुर की आय शामिल नही है ) और क्या ये सत्य नही नही है की आज भी यहाँ लगभग आधे लोग गरीब हैं, और ज्यादातर गाओं वाले नही है ?

३। क्या भात्रत के लिए उदोगपति किसान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जब लगभग ७०% लोग वही रहते है ?

४। भारत के प्रथम राष्ट्रपति ने हमें स्वालंबी होने की सलाह नही दी थी ? क्या, उसके बाद किसी भी ने इस पर गौर किया ?

५। क्या यह आश्चर्य जनक नही है की हमारे यहाँ उतने कानून हैं। जितने ज्यादा अनपढ़ हैं ?

६ क्या ऐसे कानून , जो आम आदमी समझ ना पाये या जिनको वास्तव में लागू ना किया जा सके रहना चाहिये ?

७। क्या कानूनों को बदलने की जरूरत नही है ? , जब देश का एक प्रधान मंत्री पर कई आरोप लगते है, और वो न्यायालय द्वारा बरी कर दिया जाता है, बिना circumstantial एविडेंस पर जोर दिये ?

८। क्या यह हमारी इन्वेस्टिंग अजएंसेस व न्यायालों को भी धक् के दायरे में नही लाता ?

९। क्या हम ऐसा सपना नही देख रहे, बिना साधन के हम चाँद पर जाना चाहते हैं ?